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हे अमिट जीव!

हे अमिट जीव तुमको प्रणाम! इन झंझावातों से लड़ता, हूं प्रतिक्षण जब कण कण मरता, निष्फल होते हैं जब प्रयास गिरता हूं जब जब अनायास जब नहीं आस एक टिकती है बस घोर निराशा दिखती है होता है मस्तक झुका हुआ लगता है जीवन रुका हुआ तब भी छोटी सी चिंगारी जो चीर निशा ये अंधियारी फिर फिर कहती है बढ़ने को और खुद से खुद ही लड़ने को जो रखती मुझको अविराम हे अमिट जीव तुमको प्रणाम! -उदय

फल पिपासु

आज जब मैं फल पिपासु चल रहा था, थक गया था और आँखें मल रहा था! फिर तभी सोचा कि मैं चल तो रहा हूँ, पर नहीं मैं जानता चल क्यों रहा हूँ? शायद धरा पर कीर्ति पाने के लिए, जग के हृदय बन मेघ छाने के लिये, कि हो मेरा यशगान इस संसार में, कि कुछ करूँ हो मान इस संसार में। फिर लगा है किन्तु प्रभुता शब्द क्या? अंत क्या है? और है आरब्ध क्या? कीर्ति का है कौन पा पाया फलक? छा सकूंगा मैं भी किस सीमा तलक? कि इस धरा पर कौन हो पाया अजय, कह दो समय पर कौन पा पाया विजय? वे शक्तिशाली और धुरंधर विश्वव्यापी, देखो मिले हैं राख में वे सब प्रतापी! जो भी ऊंचाई में थे पर्वत के सानी हो गए, काल की एक छींक से देखो वो पानी हो गए! ये छद्म हैं अभिमान के पर्वत मलय, बस सत्य केवल शून्यता का है वलय! बस काल की बढ़ती दिशा एक सत्य है, मृत्यु की आती निशा एक सत्य है! दूजों से मेरी दौड़ केवल झूठ है, बस कर्म की जिजीविषा एक सत्य है! आज मैं मायारहित कुछ खोजता हूँ, कर्म करता हूँ नहीं कुछ सोचता हूँ, अब तलक किस भावना में पल रहा था? जब तलक मैं फल पिपासु चल रहा था। - कान्हा जोशी 'उदय'

डायरी का आखिरी पेज

डायरी का आखिरी पेज  (diary ka akhiri page)                    - कान्हा जोशी 'उदय'  आज पलट रहा था पुरानी डायरी के कुछ पन्ने कई नज़्में मिली इतराती हुई कुछ में लोग थे, ये ज़माना था कुछ में  कुछ नहीं था बस अफ़साना था कुछ में नौसीखिए शायर की ज़ुबाँ बासी थी कुछ में नए लफ्ज़ पिरोये थे अच्छी नक्काशी थी कुछ मंचों में पढ़ते पढ़ते पुरानी हो गयी थी कुछ बर्फ सी सख़्त कुछ पानी हो गयी थी पर डायरी के आखिरी पेज पर कुछ आधी अधूरी, टूटी फूटी लाइनें मिलीं जो न तो थी दिखाने के काम की न ही महफ़िलों में सुनाने के काम की कुछ पन्नों को तो हिस्सों में बाँट दिया था कुछ लाइनों को लिखकर बस काट दिया था कुछ अच्छी बनी नहीं उनसे रूठ गया कुछ को बुनते बुनते शायद मैं खुद ही टूट गया पर सच कहूँ, जो ये अनकही खामोशी ढेर सारी है ये अधूरी बातें, पूरी नज़्मों पर भारी हैं एक यही अधूरापन है खुद को पाने के लिए बाकि सब तो है बस दुनिया को सुनाने के लिए ये न नज़्म हैं, न ग़ज़लें हैं, न कविता, न शायरी हाँ, पर इनके बिना कुछ अधूरी है डायरी...

समंदर

गोते लगाकर ही है मुमकिन जानना इसको, हाँ इस समंदर में छिपे कुछ राज़ गहरे हैं, और भाप न हो जायें तुम जल्दी समझ लेना; मुझमें ओस की बूँदों से ये कुछ भाव ठहरे हैं। आँखें खुली मेरी तो प्यादों से घिरा पाया, मियां ये ज़िन्दगी शतरंज, हम अदने से मोहरे हैं, और अब खुदा रहता नहीं मंदिर मज़ारों में, वहाँ बस पत्थरों पर आज इंसानों के पहरे हैं। सबकी तरह मर जाओगे बस चीख कर तुम भी, तुम्हारे दर्द सुनने को यहाँ सब लोग बहरे हैं, तुम ही बताओ तुम को मैं पहचान लूँ कैसे? यहाँ लोगों के चेहरे हैं, फिर उन चेहरों पे चेहरे हैं।

बैसाखियों से शिकायत

आज मेरी बैसाखियों को कुछ गुरूर हो गया, हाँ बैसाखियाँ मेरी ज़रूरत तो नहीं, लेकिन घर पर पड़ी बैसाखियाँ, और थोड़े कमज़ोर कदम, अकसर रिश्ता जोड़ लिया करते हैं। पहले धीरे-धीरे मेरा हिस्सा बनीं, फिर मेरा सहारा, और अब मेरा अस्तित्व बनकर, मिटा रहीं हैं मुझे धीरे-धीरे... गुमाँ है उन्हें कि उनके बगैर, मेरा सफर मुकम्मल नहीं है! मेरे कमज़ोर क़दमों का कोई कल नहीं है! हाँ, ज़रूरत थी मुझे उन लकड़ी के टुकड़ों की, पर निकालकर रख दिया है उन्हें उतारकर, घर के उसी कोने पर, क्योंकि, सहारे के लिए नहीं सहना चाहिए किसी का गुरूर! धीमे कदम भी गर हर रोज़ चलेंगे तो मंज़िलों तक पहुचेंगे ज़रूर! -कान्हा जोशी 'उदय'

हे मृत्यु!

हे मृत्यु! हे प्रिये! तुम बुला रही हो न? दूर खड़ी अदृश्य क्षितिज से, तुम आवाज़ लगा रही हो न! तुमसे ये क्षणिक मिलन, ज्ञान सारगर्भित है, सन्नाटों में छिपा हुआ, शोर तुम्हारा निश्चित है, तुमसे बहतर कौन प्रियसी, संभव है मुझको मिलना! जो करती है मेरी प्रतीक्षा, साँसों की हर सीमा के परे, जीवन के किसी पड़ाव पर, घड़ी के किसी कांटे पर! अभी भौतिक जीवन है, तुमसे मिलकर हो जाऊँगा, केवल तुम्हारा...’एक दिन’! 'उदय'

गुज़रता वक़्त, बदलती दुनियां

लोगों के बदले नक़ाब, किरदार अभी भी वैसा है, खुल गयी दुकानें मरहम की; बाज़ार अभी भी वैसा है |  तुम से कुछ है तो अपने हो, कुछ नहीं तो फिर तुम गैर सही, बस मोल बदलता रहता है; व्यापार अभी भी वैसा है | हैं दिए वही, हैं रंग वही, और वैसे ही हम तुम भी हैं, बस खुशियाँ थोड़ी कम सी हैं; त्यौहार अभी भी वैसा है |  कुछ फ़र्क नहीं है अब भी इन, हर पल बढती सी चोटों में, बस सह कुछ ज्यादा लेता हूँ, पर वार अभी भी वैसा है | पूछ रहे हैं लोग रोज़,  कि कैसे हैं हालात मेरे, बस खबर बदलती रहती है, अखबार अभी भी वैसा है | मैं तो अब भी उन हंसी ठहाको, की यादों को गिनता हूँ, अब महफिल कम ही जमती है; दरबार अभी भी वैसा है | -कान्हा जोशी 'उदय'