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रूमी से दो बात

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कहो रूमी! सच्चाई और झूठ के परे, मैदान की तलाश, पूरी हुई क्या तुम्हारी? जवाब दो... कि मिल सका क्या वो शहर? जिसमें बैठे थे तुम सजाए, ...मिलने का स्वप्न! कि जिसमें तुम और तुम्हारी प्रेमिका, रहते हर 'दुनियापन' के परे  केवल तुम्हारे चश्मे से दिखती, ...अच्छाई के महल में बेपरेशां! नहीं मिला होगा शायद... क्योंकि ये दुनियां परे नहीं है, सच्चाई और झूठ के! मसलन...साथ है इनके! मिश्रित और अविभक्त... कि इसमें घुला हुआ है सब, ठीक इन रंगों की तरह... काला या सफ़ेद नहीं, ...सब कुछ सलेटी तो अब कहो रूमी! सच्चाई और झूठ के 'साथ', मैदान की तलाश, पूरी हुई क्या तुम्हारी? -uday  

काबिल

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 हो ना खुश ऐ आसमां! तेरे मुकाबिल हूं अभी,  गिर गया तो क्या हुआ, उठने के काबिल हूं अभी! -uday

मौन

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जंगल तेरा, शासन तेरा, मौन हमारा, भाषण तेरा! तुझको बोलो, ये हैं रोते, तेरे मिट्ठू, तेरे तोते! तुझसे ऊंचा? कट गई पाँखे! आप पे नज़रें? फोड़ दी आँखें! आवाज़ें? तेरी निगरानी! सबके आँसू, तेरा पानी!            - उदय

पत्र

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जो मेरे इस मौन पर भी, शोर अपना कर रहे हैं! फिर अहम के पर्वतों से, खोल खुद के पर रहे हैं! आज फिर कह दो उन्हें मैं एक कहानी गढ़ रहा हूं! सुनसान दर्रों का पथिक हूं पर्वतों को चढ़ रहा हूं! नेह के संबंध जो कल तक मेरे थे... देखता हूं दूसरों की ओर जाते! उगते सूरज में निहित सम्मान है जो, खोखली करता है विश्वासों की बातें! दूर वैभव पर टिके हर प्रेम से अब, जो मेरा संघर्ष, असफलता समझता! दूर झूठों पर टिके हर नेह से अब, प्रिय मुझे जिसकी थी वो झूठी सरलता! हूं अकेला और प्रतिद्वंदी स्वयं का, बिन थमे हर रोज़ आगे बढ़ रहा हूं! .....सुनसान दर्रों का पथिक हूं पर्वतों को चढ़ रहा हूं! - उदय

Badaraa khoye

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  Badaraa khoye                 -Kanha Joshi 'Uday' Gagan ghan ghor baajat phire, jag pyaasa hai kaise tare! Badaraa ko udaati pawan, Takate hain ye chaatak nayan! Apalak dekhte hain gagan,  ...... Kaise ek moti gire!!! Gagan ghan ghor baajat phire, Ye jag pyaasa hai kaise tare!

घर

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घर      - कान्हा जोशी 'उदय' शोर को लोरी समझकर, ख़्वाब जब से सो गया है, इस शहर के बीच उसका, घर कहीं गुम हो गया है! उससे ज़माने ने कहा, अपना नजरिया छोड़ दे, हां वो अंधा तो नहीं है, उसका चश्मा खो गया है! इस शहर के बीच उसका, घर कहीं गुम हो गया है!

सवाल और कलम

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सवाल और कलम          - कान्हा जोशी 'उदय' हमने उनसे कलम मांगी, उन्होंने हमें थमा दी... तलवारें और बन्दूक! हमने उनसे स्याही पूछी, तो उन्होनें हमें दिखाया... उनके इतिहास में बहता खून ! जब हमने उनसे रस्ता पूछा,  तो छोड़ आये हमें, आँखों में पट्टी बांधे चलते , ...लोगों की भीड़ में! हम भी चलते गये! लेकिन अब भागना ज़रूरी है, आँखें खोलने,  स्याही भरने, और कलम पकड़ने के लिए! क्योकि सवाल....  कलम पूछती है, ...तलवारें और बंदूकें नहीं!