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शब्द

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शब्द...नहीं शब्द! प्रतिबिंब हैं! खुद में शून्य, ...पर देखते हैं; आंखों के रास्ते, परछाई अंतर्मन की...।  शब्द...नहीं शब्द!  महाकाव्य है!  अनंत सर्गों का,  ...आ चेतना में,  सुनाता है अनवरत,  एक शब्द में छिपी,  कई कथाएं...। शब्द...नहीं शब्द!  शरीर हैं! तुमसे मिलकर तुम्हारे, मुझसे मिलकर मेरे! ...मिटते नहीं साथ रहते हैं धमनियों में, अमिट...जीवनपर्यंत...!  

किरमौई त्राण

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मैल कब यौ चा मकैं पर्बत बणाया, (When did I ask you to make me a mountain?) जो मैं झुक लै नी सकूं, उस झन बणाया, (If I cannot bow myself down...don't make me that!) मैल कब यौ चा मकैं सूरज बणाया, (When did I ask you to make me sun?) पास ऊणी को भड़्यूं उस झन बणाया, (I don't want to burn down my closed ones...don't make me that!) जस छूं मैं उसी कै चलुंल जब तक छ प्राणा, (I wish to remain as myself till the last breath) जै दी सकछा तो दियो किरमौई त्राणा... (If you can give something, just give me Emmet's strength) तब नी रुकुल गिरि गिरि बे माठूमाठ हिंटूल! (Then I will walk, crumbling...but will not stop) मथैं ठुल जो होल ऊं धाणक सित उठूंल! (As I will lift Paddy's grains, only those which're bigger than me!) उदय Listen to the narration (podcast link)

रूमी से दो बात

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कहो रूमी! सच्चाई और झूठ के परे, मैदान की तलाश, पूरी हुई क्या तुम्हारी? जवाब दो... कि मिल सका क्या वो शहर? जिसमें बैठे थे तुम सजाए, ...मिलने का स्वप्न! कि जिसमें तुम और तुम्हारी प्रेमिका, रहते हर 'दुनियापन' के परे  केवल तुम्हारे चश्मे से दिखती, ...अच्छाई के महल में बेपरेशां! नहीं मिला होगा शायद... क्योंकि ये दुनियां परे नहीं है, सच्चाई और झूठ के! मसलन...साथ है इनके! मिश्रित और अविभक्त... कि इसमें घुला हुआ है सब, ठीक इन रंगों की तरह... काला या सफ़ेद नहीं, ...सब कुछ सलेटी तो अब कहो रूमी! सच्चाई और झूठ के 'साथ', मैदान की तलाश, पूरी हुई क्या तुम्हारी? -uday  

काबिल

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 हो ना खुश ऐ आसमां! तेरे मुकाबिल हूं अभी,  गिर गया तो क्या हुआ, उठने के काबिल हूं अभी! -uday

मौन

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जंगल तेरा, शासन तेरा, मौन हमारा, भाषण तेरा! तुझको बोलो, ये हैं रोते, तेरे मिट्ठू, तेरे तोते! तुझसे ऊंचा? कट गई पाँखे! आप पे नज़रें? फोड़ दी आँखें! आवाज़ें? तेरी निगरानी! सबके आँसू, तेरा पानी!            - उदय

पत्र

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जो मेरे इस मौन पर भी, शोर अपना कर रहे हैं! फिर अहम के पर्वतों से, खोल खुद के पर रहे हैं! आज फिर कह दो उन्हें मैं एक कहानी गढ़ रहा हूं! सुनसान दर्रों का पथिक हूं पर्वतों को चढ़ रहा हूं! नेह के संबंध जो कल तक मेरे थे... देखता हूं दूसरों की ओर जाते! उगते सूरज में निहित सम्मान है जो, खोखली करता है विश्वासों की बातें! दूर वैभव पर टिके हर प्रेम से अब, जो मेरा संघर्ष, असफलता समझता! दूर झूठों पर टिके हर नेह से अब, प्रिय मुझे जिसकी थी वो झूठी सरलता! हूं अकेला और प्रतिद्वंदी स्वयं का, बिन थमे हर रोज़ आगे बढ़ रहा हूं! .....सुनसान दर्रों का पथिक हूं पर्वतों को चढ़ रहा हूं! - उदय

Badaraa khoye

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  Badaraa khoye                 -Kanha Joshi 'Uday' Gagan ghan ghor baajat phire, jag pyaasa hai kaise tare! Badaraa ko udaati pawan, Takate hain ye chaatak nayan! Apalak dekhte hain gagan,  ...... Kaise ek moti gire!!! Gagan ghan ghor baajat phire, Ye jag pyaasa hai kaise tare!