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हाेल्यार

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मैं लगाके दाढ़ी मूछ बाल, मुंह पर मलकर लाया गुलाल, अपनी तो सारी शर्म फेंक दादरा कहरवा ताल टेक इस फाग में हंसी ठहाकों के कुछ रंग जमाता हूं आओ मैं होल्यार हूं फिर एक स्वांग रचाता हूंं उदय

दीपक

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है राह वो जिस पर पथिक चलते थे, चलते हैं; हैं स्वप्न वो सब में ही जो पलते थे, पलते हैं; ये भाव वो ही हैं जो थे उत्कृत अजंता में, ये शब्द वो ही हैं जो थे कल्पों से चिंता में, अब क्या है अंतर इस जगत की काल रेखा में? अनुसूचित हुए और कट गए सब लोग लेखा में! बस रो रहे अपने ही चयनित युद्ध में भिड़कर, लघु हैं ये बातें जान, पर लघुता से ही चिढ़कर, हम हैं नहीं वो जो अनत अक्षय में पलते हैं! हम हैं निरे दीपक जो बस जलते हैं, ढलते हैं! उदय

Kaagazi

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Kaagazon mai hai kahaani Kaagazi kirdaar hai Kaagazi rishton ke aage Kaagazi deewar hai Kaagazi ye waqt hai Jo boond padkar gumshuda Kaagazi si bheed hai Jo saath hai par hai juda Kaagazi ye khwab hai Ki "zindagi us paar hai" Kaagazi rishton ke aage Kaagazi deewar hai -Uday

ए बी सी डी १

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जीवन में कई बार कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिनका अर्थ या महत्व उस क्षण तो समझ नहीं आ पाता किंतु कोई आने वाला अगला पड़ाव उसके महत्व को आंखों के सामने स्पष्ट कर देता है। आज से लगभग ९ वर्ष पूर्व एक सशक्त व्यक्तित्व से मेरा परिचय हुआ। एक दिन बातों ही बातों में जब मैंने उनकी वृद्धावस्था पर टिप्पणी की तो उन्होंने एक वाक्य कहा कि "कान्हा जब तक तुम समाज की किसी आवश्यकता को पूरा करते हो तब तक तुम उसके लिए प्रासंगिक हो, वृद्धावस्था तुम्हारी शक्ति को समाप्त करती है और तुम्हें अप्रासंगिक कर देती है..." अब ये विचार उस समय बस एक वाक्य था, स्मृति में ना जाने क्यों स्थापित था; पर आज जीवन के इस पड़ाव पर आकर इसका यथार्थ पूरी नग्नता से सामने खड़ा नज़र आता है। बात ये है कि ये केवल वृद्धावस्था तक सीमित नहीं है, ये जीवन के संघर्ष के समय का भी सत्य है। संघर्ष करने वालों और संघर्षों के प्रकार असीमित हैं किन्तु सफलता सीमित है... जितनी विशाल सफलता है, उतना ही बड़ा संघर्ष! अब क्योंकि संघर्ष करने वालों की संख्या अधिक है, और संघर्षमय रहते हुए वो समाज की किसी आवश्यकता की सिद्धि नहीं करते तो सबके लिए अप्रासंगि...

तपिश

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सांझ ढलते आसमां ने तारों के दीपक जलाए ताकि तन्हा एक मुसाफिर राह अपनी जान पाए छाले पैरों में पड़े जो हर दिलासा बेअसर है सोई दुनिया में वो जागा चल रहा किसको खबर है धुंध आगे, रात गहरी, एक दिए की लौ जली है उस दिए की रोशनी से ज़िन्दगी कितनी पली हैं एक क़दम है सामने, औ' उस क़दम पर ही नज़र है सोई दुनिया में वो जागा चल रहा किसको खबर है - उदय

नूर-ए-सहर

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अपनी आंखों से हैं पाले रात के सारे पहर! और क्या कीमत भरूं तू ही बता नूर-ए-सहर? (  नूर-ए-सहर - light of the dawn; पहर - unit of time) मुस्कुराकर पी रहा हूं घूंट उन प्यालों से मैं, जिनमें साकी ने भरी है थोड़ी मय, थोड़ा ज़हर! ( साकी - bartender, मय - liquor) कल रात श्मशानों से ऐसी आ रही आवाज़ थी, किसकी दुनियां? कौन राजा? कैसा घर? किसका शहर? - कान्हा जोशी उदय

शब्द

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शब्द...नहीं शब्द! प्रतिबिंब हैं! खुद में शून्य, ...पर देखते हैं; आंखों के रास्ते, परछाई अंतर्मन की...।  शब्द...नहीं शब्द!  महाकाव्य है!  अनंत सर्गों का,  ...आ चेतना में,  सुनाता है अनवरत,  एक शब्द में छिपी,  कई कथाएं...। शब्द...नहीं शब्द!  शरीर हैं! तुमसे मिलकर तुम्हारे, मुझसे मिलकर मेरे! ...मिटते नहीं साथ रहते हैं धमनियों में, अमिट...जीवनपर्यंत...!