ग़ौर-ओ-फ़िक्र

ग़ौर-ओ-फ़िक्र

         - कान्हा जोशी उदय 


रोशनी तो ना हुई, पर शमा जलती रही 

ज़ुल्फ़ लहराई नहीं, पर हवा चलती रही 


मेरे घर में आ गए हैं वो शहर को लूट कर 

मैं रहा ख़ामोश शायद ये मेरी ग़लती रही 


मुझको अपनी मुट्ठियों में शोहरतें तो ना दिखी 

पर फिसलती रेत की मुझको कमी खलती रही 


सोच में हूँ जब से उस कम्बख़्त ने अंकल कहा 

कब बढ़ा ये कारवाँ कैसे उमर ढलती रही  

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