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Showing posts from May, 2022

बीज

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  दबकर पग पग इन भारों से, हाँ टूट गए होंगे मानव , शव नहीं चिरंतन बीज हूँ मैं, मिट्टी में जो दब सृजित हुआ! तारों पर निर्भरता से, जो ताप तजे वो पूर्ण कहाँ, मैं चंद्र नहीं, हूँ सूर्य स्वयं, खुद निशा चीर जो उदित हुआ! कल के अमृत की आशा में, जग त्याग रहा जल के झरने, मैं वर्तमान का हूँ शंकर, जो गटक हलाहल विजित हुआ! - कान्हा जोशी ' उदय'

कैसे?

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 ख़ुद के रंग आँखों बिन,  भला पहचानता कैसे?  उसमें थी महक कितनी,  गुलिस्तां जानता कैसे?  होता अकेला गर वो,  तो आहट समझ लेता,  वहाँ तब भीड़ ज़्यादा थी,  मुझे पहचानता कैसे?  .....खुद में थी महक कितनी,  गुलिस्तां जानता कैसे?  है हाथ में खंजर लिया,  फिर भी छुपाता है,  किया है क़त्ल उसने ही,  वो खुद से मानता कैसे?  ....खुद में थी महक कितनी,  गुलिस्तां जानता कैसे? - Kanha Joshi 'Uday'