कैसे?
ख़ुद के रंग आँखों बिन,
भला पहचानता कैसे?
उसमें थी महक कितनी,
गुलिस्तां जानता कैसे?
होता अकेला गर वो,
तो आहट समझ लेता,
वहाँ तब भीड़ ज़्यादा थी,
मुझे पहचानता कैसे?
.....खुद में थी महक कितनी,
गुलिस्तां जानता कैसे?
है हाथ में खंजर लिया,
फिर भी छुपाता है,
किया है क़त्ल उसने ही,
वो खुद से मानता कैसे?
....खुद में थी महक कितनी,
गुलिस्तां जानता कैसे?
- Kanha Joshi 'Uday'

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