Posts

सवाल और कलम

Image
सवाल और कलम          - कान्हा जोशी 'उदय' हमने उनसे कलम मांगी, उन्होंने हमें थमा दी... तलवारें और बन्दूक! हमने उनसे स्याही पूछी, तो उन्होनें हमें दिखाया... उनके इतिहास में बहता खून ! जब हमने उनसे रस्ता पूछा,  तो छोड़ आये हमें, आँखों में पट्टी बांधे चलते , ...लोगों की भीड़ में! हम भी चलते गये! लेकिन अब भागना ज़रूरी है, आँखें खोलने,  स्याही भरने, और कलम पकड़ने के लिए! क्योकि सवाल....  कलम पूछती है, ...तलवारें और बंदूकें नहीं!                                           

रोटी

रोटी            - कान्हा जोशी 'उदय' ढोलक और चम्मच लिए,  शोर से लड़ता बचपन, गा रहा है... नाचती धुनों में छिपी, अपनी एलिगी... आँखें मीचे, जिस्म ताने,  खींच रहा है सुर, जैसे बुला रहा हो  चीख-चीखकर... एक लोथा, एक कौर,  ....और एक छत! बर्फ है या आग? कभी चिल्लाता मदहोश, तो अभी साकिन,चुपचाप... ...ताकता है दुनिया, या शायद देखता हो... फंदे से लटके मोज़ार्ट, हथकटे पिकासो, और गूंगे तानसेन! गाड़ी थमी है... उसे चलना है... नन्हे हाथों में सिक्कों का बोझ लिए! क्योकि...आज़ाद करानी है उसे, ढोलक और गीतों में कैद,  .....  उसकी अपनी रोटी   

चश्मा

Image
उसने रोशनी के बीच रातों को पिया होगा, वो अगर ऐसे जिया तो क्या जिया होगा? आज उसकी शक्ल पर ज़्यादा हंसी है जो, कल उसी ने दर्द कुछ ज़्यादा लिया होगा। अब तुझे दुनियां में बस एक रंग दिखता है, तेरी भी आंखों में चश्मा सिल दिया होगा। - उदय

उपेक्षित खामोशी

      नमस्कार मित्रों! कुछ ही समय पूर्व हम उन दिनों से दो-दो हाथ करके आए हैं जिन दिनों में एक विद्यार्थी को अनायास ही 'वक्त की कीमत' महसूस होने लगती है..जी हाँ! सही समझे आप, परीक्षा के दिनों से...परीक्षाओं की समय-सारिणी आने के साथ ही 'दिलों की घबराहट' और 'नोट्स की फोटोकॉपी कराने' का सिलसिला शुरू हो गया..जैसे-जैसे दिन करीब आने लगे छात्रों के मुख से 'आध्यात्म' और 'भगवान के प्रति अगाध श्रद्धा' के प्रवचन सुनाई देने लगे...'बड़ी मार्केट' के दुकानदारों की धूप-बत्ती की बिक्री बढ़ने लगी..और शुरू हुआ एक महत्वपूर्ण दौर..परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए आवश्यक अंकों की गणनाओं का दौर..परीक्षा काल में तो विद्यार्थियों की स्थिति अत्यन्त दुर्दमनीय थी...छात्रावास के गलियारों में छात्र किताबें लेकर ऐसे दिखाई देते जैसे दो दिन से लगातार सफर कर रहा यात्री बस स्टेशन पर शौचालय ढूँढ रहा हो...      आखिरकार परीक्षाएँ समाप्त हुई...आधे खाली हुए 'अगरबत्तियों के पैकेट' और 'फोटोकॉपी कराए गए नोट्स' कमरे के बाहर फेंके जाने लगे...और अब छात्र एक दूसरे के कं...

यहीं तो है

Image
यहीं तो है... इस कमरे के ठीक बाहर, मेरे सुकून की तासीर... घाटियों की  हवा, ठंडे सोते का पानी, और बरगद की सी छांव लिए! खुशबू तो जैसे... आम का पहला बौर! और स्पर्श.... ठीक मरू पर टपकती बारिश की बूंदों सा! पर कैद हूं... दरवाज़े पर खड़ा वक़्त का रिज़वान, जाने नहीं देता!

फिसलती रेत

Image
फिसलती रेत के साथ, छीन लिए जाते हैं बेबाक ठहाके, रोक दी जाती हैं बेपरवाह दौड़ें, और रोने की आज़ादी भी.... सब कुछ एक सलीके से, ...जिसे तुम तय नहीं करते! ठीक वैसे ही, जैसे गूंथी जाती है मिट्टी! रखी जाती है पुराने चाक पर, और जिसे घुमाकर 'उन' तरीकों से, बन जाते हैं एक से बर्तन... फिर लग जाती है  कतार, सब बिकने को तैयार... लेकिन अफसोस! ..मिट्टी, मिट्टी नहीं रहती! -uday

निशा के सामने की भोर

इस निशा के सामने की भोर, मेरी कल्पनाओं में चमकते; कोटि स्वप्नों के अनूठे चित्र लेकर, चल रही प्रतिपल निरंतर... बाहरी इस शांति के आडंबरों से, मेरे अंतर में  यदि तुम झांक पाओ, तो करोड़ों संशयों के बीच, होगा एक थका हारा पथिक, जो चल रहा है... जो किसी दिन प्रेरणा के ज्वार से उद्विग्न होकर, भाग पड़ता है अचानक! तो किसी दिन हार कर और फिर पड़ा सा, रक्त से लथपथ अकेला रेंगता है! क्या पता है सामने एक स्रोत निर्मल, या मरीचिका है बुलाती पास उसको! पर जो भी हो, जैसा भी हो; वो रुक नहीं सकता... क्योंकि 'अंतर' के लिए चलना उसे होगा निरंतर, हार कर भी, टूट कर भी, बंधनों से छूट कर भी! अपने लोचन मूंद कर जो सत्य दिखता है उसे उसके लिए, पुष्प को जब त्याग कंटक था चुना उस एक निश्चय के लिए...