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Father and the Tree

  Father and the Tree                - Kanha Joshi ‘Uday’ Twice a year, I visit home— Once in autumn, And once in monsoon. During autumn, The tree standing in our courtyard Sheds its leaves, Its branches turn dry And grow weak. Watching it, Father, lost in thought, Consoles himself, saying, “There’s nothing to worry about, The tree will turn green again in monsoon.” Now, once again, I have returned home in monsoon. The tree stands tall, lush, and strong, And with pride, Father says, “Look! The tree has come back to life.” Father is happy. And as I watch him, I wonder— Why is it that, after growing weak in autumn, Only the tree gets to flourish again?

प्रवाह

प्रवाह  - कान्हा जोशी उदय  मुट्ठियों में भींचकर हम, रोकना चाहें अगर कुछ, ....रुक नहीं पाता कभी! रुक नहीं पाता समय, ....जो है निरंतर ; रुक नहीं पाते... कोई संबंध भी तो! रेत सा रस्ता बनाकर हैं फिसलते, हारते हैं मुट्ठियों के बंध भी तो! रुक नहीं पाता कोई... मृत हो रहा अपना! रुक नहीं पाता वो, सुन्दर सत्य या सपना! रुक नहीं पाती, ये पकती मौसमों में देह! रुक नहीं पाता, किसी का क्षीण होता नेह! संघर्ष से भी सींचकर हम थामना चाहें अगर कुछ  …थम नहीं पाता कभी! मुट्ठियों में भींचकर हम, रोकना चाहें अगर कुछ, ....रुक नहीं पाता कभी!

रोता हुआ आदमी

रोता हुआ आदमी - कान्हा जोशी 'उदय' रोता हुआ आदमी, अपने नरम आंसुओं से, गला रहा होता है, एक कठोर कारागार... जिसमें लगी हैं, सदियों पुरानी सलाखें, जिन्होंने जकड़ी है, झूठी मज़बूती के आवरण में, एक पुरुष की आत्मा... काश किसी दिन अखबार में, कोई लेख लिखे, कोई शोध छपे, जो बताए दुनिया को, कि आदमी रो सकता है, ... कि रोता हुआ आदमी, सबसे सुंदर होता है !

माउथॉरगन

माउथॉरगन  कान्हा जोशी उदय  

उदय

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 अगर तुम मुझे,  छोड़ दोगे,  नीरव अंधेरी गुफाओं के भीतर,  मरने के लिए,  और तोड़ दोगे,  मेरे शरीर की हर एक पसली,  तो मैं उस अंधेरे और सन्नाटे के बीच,  अपने शरीर से बहते रक्त को,  रोक अपने हाथों से,  खड़ा होऊँगा फिर एक बार,  और ढूँढने निकलूंगा,  प्रभात की एक किरण,  और अगर लगे,  कि असंभव है,  मिलने इस कालिमा में,  रोशनी के टुकड़े,  तो उसी क्षण जला कर स्वयं को,  कर दूंगा तिरोहित,  जैसे यज्ञ में मिलती हो आहुति,  जैसे आग में जलते हों पतंगें,  और जैसे,  ब्रह्मांड की कालिमा में,  प्रतिक्षण जलकर होता हो सूर्य का 'उदय'

बीज

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  दबकर पग पग इन भारों से, हाँ टूट गए होंगे मानव , शव नहीं चिरंतन बीज हूँ मैं, मिट्टी में जो दब सृजित हुआ! तारों पर निर्भरता से, जो ताप तजे वो पूर्ण कहाँ, मैं चंद्र नहीं, हूँ सूर्य स्वयं, खुद निशा चीर जो उदित हुआ! कल के अमृत की आशा में, जग त्याग रहा जल के झरने, मैं वर्तमान का हूँ शंकर, जो गटक हलाहल विजित हुआ! - कान्हा जोशी ' उदय'

कैसे?

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 ख़ुद के रंग आँखों बिन,  भला पहचानता कैसे?  उसमें थी महक कितनी,  गुलिस्तां जानता कैसे?  होता अकेला गर वो,  तो आहट समझ लेता,  वहाँ तब भीड़ ज़्यादा थी,  मुझे पहचानता कैसे?  .....खुद में थी महक कितनी,  गुलिस्तां जानता कैसे?  है हाथ में खंजर लिया,  फिर भी छुपाता है,  किया है क़त्ल उसने ही,  वो खुद से मानता कैसे?  ....खुद में थी महक कितनी,  गुलिस्तां जानता कैसे? - Kanha Joshi 'Uday'