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ए बी सी डी १

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जीवन में कई बार कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिनका अर्थ या महत्व उस क्षण तो समझ नहीं आ पाता किंतु कोई आने वाला अगला पड़ाव उसके महत्व को आंखों के सामने स्पष्ट कर देता है। आज से लगभग ९ वर्ष पूर्व एक सशक्त व्यक्तित्व से मेरा परिचय हुआ। एक दिन बातों ही बातों में जब मैंने उनकी वृद्धावस्था पर टिप्पणी की तो उन्होंने एक वाक्य कहा कि "कान्हा जब तक तुम समाज की किसी आवश्यकता को पूरा करते हो तब तक तुम उसके लिए प्रासंगिक हो, वृद्धावस्था तुम्हारी शक्ति को समाप्त करती है और तुम्हें अप्रासंगिक कर देती है..." अब ये विचार उस समय बस एक वाक्य था, स्मृति में ना जाने क्यों स्थापित था; पर आज जीवन के इस पड़ाव पर आकर इसका यथार्थ पूरी नग्नता से सामने खड़ा नज़र आता है। बात ये है कि ये केवल वृद्धावस्था तक सीमित नहीं है, ये जीवन के संघर्ष के समय का भी सत्य है। संघर्ष करने वालों और संघर्षों के प्रकार असीमित हैं किन्तु सफलता सीमित है... जितनी विशाल सफलता है, उतना ही बड़ा संघर्ष! अब क्योंकि संघर्ष करने वालों की संख्या अधिक है, और संघर्षमय रहते हुए वो समाज की किसी आवश्यकता की सिद्धि नहीं करते तो सबके लिए अप्रासंगि...

तपिश

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सांझ ढलते आसमां ने तारों के दीपक जलाए ताकि तन्हा एक मुसाफिर राह अपनी जान पाए छाले पैरों में पड़े जो हर दिलासा बेअसर है सोई दुनिया में वो जागा चल रहा किसको खबर है धुंध आगे, रात गहरी, एक दिए की लौ जली है उस दिए की रोशनी से ज़िन्दगी कितनी पली हैं एक क़दम है सामने, औ' उस क़दम पर ही नज़र है सोई दुनिया में वो जागा चल रहा किसको खबर है - उदय

नूर-ए-सहर

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अपनी आंखों से हैं पाले रात के सारे पहर! और क्या कीमत भरूं तू ही बता नूर-ए-सहर? (  नूर-ए-सहर - light of the dawn; पहर - unit of time) मुस्कुराकर पी रहा हूं घूंट उन प्यालों से मैं, जिनमें साकी ने भरी है थोड़ी मय, थोड़ा ज़हर! ( साकी - bartender, मय - liquor) कल रात श्मशानों से ऐसी आ रही आवाज़ थी, किसकी दुनियां? कौन राजा? कैसा घर? किसका शहर? - कान्हा जोशी उदय

शब्द

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शब्द...नहीं शब्द! प्रतिबिंब हैं! खुद में शून्य, ...पर देखते हैं; आंखों के रास्ते, परछाई अंतर्मन की...।  शब्द...नहीं शब्द!  महाकाव्य है!  अनंत सर्गों का,  ...आ चेतना में,  सुनाता है अनवरत,  एक शब्द में छिपी,  कई कथाएं...। शब्द...नहीं शब्द!  शरीर हैं! तुमसे मिलकर तुम्हारे, मुझसे मिलकर मेरे! ...मिटते नहीं साथ रहते हैं धमनियों में, अमिट...जीवनपर्यंत...!  

किरमौई त्राण

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मैल कब यौ चा मकैं पर्बत बणाया, (When did I ask you to make me a mountain?) जो मैं झुक लै नी सकूं, उस झन बणाया, (If I cannot bow myself down...don't make me that!) मैल कब यौ चा मकैं सूरज बणाया, (When did I ask you to make me sun?) पास ऊणी को भड़्यूं उस झन बणाया, (I don't want to burn down my closed ones...don't make me that!) जस छूं मैं उसी कै चलुंल जब तक छ प्राणा, (I wish to remain as myself till the last breath) जै दी सकछा तो दियो किरमौई त्राणा... (If you can give something, just give me Emmet's strength) तब नी रुकुल गिरि गिरि बे माठूमाठ हिंटूल! (Then I will walk, crumbling...but will not stop) मथैं ठुल जो होल ऊं धाणक सित उठूंल! (As I will lift Paddy's grains, only those which're bigger than me!) उदय Listen to the narration (podcast link)

रूमी से दो बात

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कहो रूमी! सच्चाई और झूठ के परे, मैदान की तलाश, पूरी हुई क्या तुम्हारी? जवाब दो... कि मिल सका क्या वो शहर? जिसमें बैठे थे तुम सजाए, ...मिलने का स्वप्न! कि जिसमें तुम और तुम्हारी प्रेमिका, रहते हर 'दुनियापन' के परे  केवल तुम्हारे चश्मे से दिखती, ...अच्छाई के महल में बेपरेशां! नहीं मिला होगा शायद... क्योंकि ये दुनियां परे नहीं है, सच्चाई और झूठ के! मसलन...साथ है इनके! मिश्रित और अविभक्त... कि इसमें घुला हुआ है सब, ठीक इन रंगों की तरह... काला या सफ़ेद नहीं, ...सब कुछ सलेटी तो अब कहो रूमी! सच्चाई और झूठ के 'साथ', मैदान की तलाश, पूरी हुई क्या तुम्हारी? -uday  

काबिल

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 हो ना खुश ऐ आसमां! तेरे मुकाबिल हूं अभी,  गिर गया तो क्या हुआ, उठने के काबिल हूं अभी! -uday